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छठ पूजा


बिहार में छठ पूजा का अत्यंत महत्त्व है। इस व्रत को करना बहुत ही शुभ माना जाता है।  यह छठ कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला त्योहार है।  इस त्योहार में सूर्य की उपासना की जाती है।  इस पर्व की विशेषतः यह है कि  सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल सप्तमी को समाप्त होता है। पारिवारिक सुख- समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को स्त्री और पुरुष दोनों ही मनाते है।  छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना कि जाती है तथा गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या समुद्र, जलाशय के किनारे पानी में खड़े होकर यह पूजा संपन्न कि जाती है। यह पर्व चार दिन मनाया जाता है।

अब हम जानते है कि इस चार दिन के व्रत की पूजन विधि क्या है तथा इसे कैसे किया जाता है।

नहाय खाय

– पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है।  इस दिन सैंधा नमक, घी से बना हुआ हलवा, चावल और कद्दूकी सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है।

खरना

दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है इस दिन रात में खीर बनती है। उपवास अर्थात व्रत करने वाले रात में यह प्रसाद लेते हैं।

संध्या अर्ध्य

– तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं। इसके अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अतिरिक्त चढ़ावे के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।

उषा अर्ध्य

– चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं। व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत करते हैं और व्रत समाप्त होने के बाद ही वह अन्न और जल ग्रहण करते हैं। इस पूजा में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है तथा लहसून, प्याज खाते नहीं है।

पौराणिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से  धन-धान्य की प्राप्ति होती है तथा जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहता है। छठ के दौरान लोग सूर्य देव की पूजा करतें हैं , इसके लिए जल में खड़े होकर कमर तक पानी में डूबे लोग, दीप प्रज्ज्वलित किए नाना प्रसाद से पूरित सूप उगते और डूबते सूर्य को अर्ध्य देते हैं और छठी मैया के गीत गाए जाते हैं। इस दिन तामसी पदार्थ खाते नही है। घरों में भगवान को प्रसन्न करने के लिए भक्ति संगीत का आयोजन भी किया जाता है।

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